कानून के हाथ लंबे होते है,मगर............

हर रोज की, तरह, बुधवार की सुबह भी, अपने अभिव्यक्ति स्वतंत्रता का लुत्फ उठाने के लिए जैसे, ही मैंने whatsapp खोला तो पता चला की, रिपब्लिक टीवी वाले अर्णब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया है, अधिक जानकारी के लिए सोचा न्युज चैनल देख लुॅं, और, फिर क्या, न्युज चैनल देखकर एक बात समझ आयी की, क्यों, पारले जी ने कुछ दिन पहले, कुछ चैनलो को अपने विज्ञापनों का ग्लुकोज देना बंद कर दिया है., यहाँ पे न्युज कम और, अपने अपने पर्सनल व्युज ज्यादा थे.
   फिर, कुछ ठिकठाक न्यूज़ पोर्टल से पता चला की, मामला कुछ यूँ था, 
रिपब्लिक टीवी’ के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी को 53 वर्षीय इंटीरियर डिजाइनर को कथित रूप से आत्महत्या के लिए उकसाने के साल 2018 के मामले में बुधवार को गिरफ्तार कर लिया गया... ये पढकर जरूर आपके मन में सवाल आया होगा की, 2018  का मामला 2020 में कैसे उछला? 
वैसे मैं कोई मनोवैज्ञानिक तो नहीं, पर, अपने अनुभव से कह सकता हूँ की, अगर, आप रोजाना न्युज चैनल देखतें है तो, ये सवाल मन में उठने की, संभावना कुछ कम ही होती है, क्योंकि, आपका मन उस समय एकतरफा प्यार की तरह, एक साईड से ही व्यवहार करने लगता है,हो सकता हैं की, यह हर किसी पर, लागू न हो, हाँ, मगर, मसला ये था की, एक पुराना मामला अचानक कैसे उठा? तो कहीं पर, इसके जवाब में देखा गया की, 

इस वर्ष मई में महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने आर्किटेक्ट अन्वय नाइक की बेटी अदन्या नाइक की नई शिकायत के आधार पर फिर से जांच का आदेश दिये जाने की घोषणा की थी.

इसे कुछ लोग राजनैतिक बदले की भावना करार दे रहे, तो कुछ लोग इसे लोकतंत्र की हत्या कह रहे...और कुछ लोग इसे सही बता रहे...इसमें दिलचस्प बात ये है की, 

लोकतंत्र पर,हमले की बात और, अभिव्यक्ति की आजादी दबाने की, कोशिश जो लोग इस मुद्दे पर, बोल रहे,वो लोग ही भूतकाल में घटी ऐसी घटनाओं में ऐसे सवालों के जवाब में
कहते थे, "आप यहाँ और, सोशल मीडिया पर, खुल के बोल सकते है तो अभिव्यक्ति की आजादी तो बरकरार है! "
ये सब जानने के बाद, आप टीवी पर, क्या देखना चाहेंगे, 
शायद, एक स्वस्थ डिबेट, जिसमें इसे राजनैतिक बदले की भावना या पुलिस प्रशासन का दुरूपयोग बताने वालों को ऐसे बाहरी दबाव से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 22 सप्टेंबर 2006 को पोलिस रिफाॅर्म पर, जजमेंट दिया था क्या उसको सही तरीके से किसी भी सरकार ने लागू किया? 

और, जो लोग गिरफ्तारी को सही बता रहे... उनसे भी पुछना चाहिए की, 
क्या वाकई राजनीति में कोई चिज बेवजह होती है क्या?.....
 अगर, नहीं तो, 
कानून के हाथ लंबे होते हैं, मगर, बस्स! वो किसी की, जेब से बाहर हो!

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